चुनावी आहट के बीच 36 बिरादरी को जुटाने की कवायद
चंडीगढ़, 21 जुलाई (प्रेस की ताकत ब्यूरो)
हरियाणा कांग्रेस में पिछले लगभग सवा साल के दौरान दूसरे दलों के नेताओं की बम्पर एंट्री हुई है। सैकड़ों की संख्या में विभिन्न पार्टियों के नेताओं ने कांग्रेस में आस्था जताई है। इनमें 28 पूर्व मंत्री व पूर्व विधायक शामिल हैं। इसे पूर्व सीएम और विपक्ष के नेता भूपेंद्र हुड्डा को मिले ‘फ्री-हैंड’ के नतीजों से जोड़कर देखा जा रहा है। इनमें कुछ ऐसे नाम भी हैं, जो पहले भी कांग्रेस में सक्रिय रह चुके हैं। लेकिन अब भाजपा व दूसरे दलों से इन्होंने कांग्रेस में वापसी की है। कांग्रेस में शामिल होने वाले 28 पूर्व मंत्रियों व पूर्व विधायकों में से कई ऐसे हैं जो 2019 का विधानसभा चुनाव लड़ चुके हैं। इन नेताओं की कांग्रेस में एंट्री करवा कर हुड्डा गुट ने अपनी मजबूत पकड़ का अहसास करवाया है। कांग्रेस ज्वाइन करने वाले इन पूर्व विधायकों व पूर्व मंत्रियों में से 19 नॉन-जाट चेहरे हैं। इनमें अनुसूचित जाति और पिछड़ा वर्ग के 6-6, ब्राह्मण वर्ग 4, वैश्य वर्ग के 2 और एक राजपूत नेता शामिल है। कई दमदार नेता भाजपा, इनेलो, जजपा या फिर आप को छोड़कर कांग्रेस में शामिल हुए हैं। इस तरह से राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मत है कि इतनी तादात में गैर-जाट नेताओं के शामिल होने पर हुड्डा गुट के इस दावे को बल मिलता है कि हुड्डा 36 बिरादरी के नेता हैं।
‘विपक्ष आपके समक्ष’ कार्यक्रम से हुड्डा अब तक 10 में से 8 लोकसभा क्षेत्रों में सियासी ताकत दिखा चुके हैं। रोहतक और हिसार संसदीय क्षेत्र में उनका कार्यक्रम होना बाकी है। 2005 में पहली बार कांग्रेस ने उन्हें प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया था। 2009 में लगातार दूसरी बार उनके नेतृत्व में कांग्रेस सत्ता में आई। लगातार दो बार यानी 2014 और 2019 में सत्ता से बाहर रही कांग्रेस अब एक बार फिर सत्ता वापसी के लिए जोर लगा रही है।
कांग्रेसियों को लगता है कि खट्टर सरकार की दस वर्षों की एंटी-इनकम्बेंसी का फायदा उन्हें इस बार मिल सकता है। इस अवधि में कई राज्यों में दूसरे दलों के विधायकों की भाजपा में एंट्री की खबरें भी सुर्खियों में रही। इसे ‘ऑपरेशन लोटस’ नाम दिया गया। हरियाणा में कांग्रेस में शामिल हो रहे दूसरे दलों के पूर्व विधायकों की एंट्री को लेकर राज्यसभा सांसद दीपेंद्र हुड्डा चुटकी लेते हुए कहा है कि यहां ‘रिवर्स लोटस ऑपरेशन’ चल रहा है।
कांग्रेस में शामिल होने वाले पूर्व विधायकों व वरिष्ठ नेताओं में कई ऐसे चेहरे हैं, जो 2019 के विधानसभा चुनाव में टिकट के लिए मजबूत दावेदार थे। इनमें से कुछ ऐसे भी हैं, जिन्होंने टिकट नहीं मिलने की सूरत में निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ा। कांग्रेस में भी कुछ ऐसे नेता हैं, जो टिकट कटने के बाद आजाद लड़े और कांग्रेस उम्मीदवारों को पछाड़ कर नंबर-2 की पॉजिशन पर रहे। कांग्रेस में इन नेताओं का टिकट पार्टी की गुटबाजी व अंतर्कलह के कारण कटा था।
करीब सवा साल पहले कांग्रेस नेतृत्व ने हुड्डा की पसंद के चौ़ उदयभान को प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष नियुक्त किया। 2014 से 2022 तक प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष पद पर एंटी हुड्डा खेमे के नेता की नियुक्ति होती रही। हुड्डा खेमा इसे इस रूप में भी प्रचारित कर रहा है कि उन्हें फ्री-हैंड मिलने के बाद पार्टी में न केवल बड़ी संख्या में दूसरे दलों के नेता शामिल हुए हैं, बल्कि पार्टी भी मजबूत हुई है। माना जा रहा है कि हुड्डा खेमे ने अपने विरोधियों यानी एंटी हुड्डा खेमे के नेताओं के सामने बड़ा चैलेंज खड़ा किया हुआ है।
कांग्रेस, मुख्य रूप से हुड्डा गुट पर, यह आरोप लगते रहे कि वे जाटों को तवज्जो दे रहे हैं। हुड्डा खेमे ने गैर-जाट चेहरों को कांग्रेस में शामिल करवा कर यह जता दिया कि इन आरोपों में दम नहीं है। जिन चेहरों को उन्होंने कांग्रेस में शामिल करवाया है वे प्रदेश के अलग-अलग कोनों से हैं। हर जाति वर्ग के लोगों की कांग्रेस में एंट्री करवा कर हुड्डा गुट ने पार्टी नेतृत्व में भी यह मैसेज देने की कोशिश की है कि राज्य में कांग्रेस को न केवल मजबूती मिल रही है, बल्कि सभी वर्गों के लोगों में पार्टी के प्रति रुझान भी बढ़ा है।
तिकड़ी की चुनौती
इन दिनों एंटी हुड्डा खेमे के नेताओं ने आपस में हाथ मिला लिया है। प्रदेश में कांग्रेस नेताओं का नया ग्रुप एसआरके उभरकर आया है। एसआरके यानी कुमारी सैलजा, रणदीप सुरजेवाला और किरण चौधरी। अब देखना रोचक होगा कि हुड्डा का कितना मुकाबला यह ‘तिकड़ी’ कर पाती है। दोनों गुटों में आने वाले दिनों में सियासी घमासान और तेज होने के आसार हैं।













