इटावा(डा. पुष्पेंद्र सिंह चौहान)- चंबल_घाटी के भरेह_स्टेट के रूप सिंह सेंगर बगावती तेवरों ने इतिहास के पन्नों में हौसले और जज्बे की मिसाल को दर्ज करा दिया।
जनपद इटावा और औरैया के बीच स्थित भरेह के किले की है
बताते चलें कि ब्रिटिश हुकूमत के जुल्मों सितम से तंग आकर 1857 में बगावत की चिंगारी ने पूरे देश में स्वाधीनता का रूप ले लिया था। जिसमें चंबल घाटी के भरेह स्टेट के बगावती तेवरों ने इतिहास के पन्नों में हौसले और जज्बे की मिसाल को दर्ज करा दिया। बदलाव के दौर में आज और हिम्मत और बुलंद इरादों का गवाह भरेह किला शासन और प्रशासन के उपेक्षित रवैए के चलते जमींदोज होने की कगार पर पहुंच गया है। मुगलों के आने से पूर्व कन्नौज के हिंदू राजा जयचंद द्वारा अपनी पुत्री देवकला का विवाह राजस्थान के डहार नामक स्थान के सेंगर वंश के वीर विशोक देव के साथ करने के बाद दहेज में दी गई रियासत के एक भाग भरेह स्टेट पर पीढ़ी दर पीढ़ी कई सेंगर राजाओं ने शासन किया।
इसी दौरान भरेह स्टेट में राजा रूप सिंह का उल्लेख आता है उनकी हिम्मत और जज्बे को याद कर लोगों के चेहरों पर अजीब सी खुशी खिल उठती है। उन्होंने स्वाभिमान और माटी की लाज बचाने को लेकर सत्ता मोह ही नहीं त्यागा बल्कि अंग्रेजों के आगे सीना तानकर बगावत कर दी और चंबल इलाके में जाबाजो में देशभक्ति की भावना जगा कर क्रांति में कूद पड़े। जब अंग्रेजों ने बगावत के एक बड़े गढ़ भरेह पर अपना दबाव बनाया तो राजा रूप सिंह अपनी छोटी सैन्य टुकड़ी लेकर झांसी की रानी लक्ष्मीबाई से मिले और लगातार इस क्षेत्र में क्रांति की मशाल जलाते रहे। अंग्रेजों ने कोई दबाव काम न आता देख चंबल के आजादी के दीवानों के इस किले पर तोपों से गोले दागकर क्षतिग्रस्त कर दिया। मगर राजा रूप सिंह का हौसला नहीं तो सके।
चंबल यमुना के संगम तट समुद्र तल से लगभग 520 मीटर ऊंचाई पर खंडहर ऐतिहासिक किले की पश्चिमी दीवार से नीलवर्ण चंबल की चपलता और उत्तरी दीवार से कालिंदी की धारा की अठखेलियां मनोहारी दृश्य बनाती हैं। चंद कदमों की दूरी पर सनातनी मान्यता का प्रतिनिधित्व कर रहा भारेश्वर महादेव का विशाल शिवालय साल भर आने वाले श्रद्धालुओं का केंद्र है। यहां किले की दुर्दशा को देख लोग विचलित हुए बिना नहीं रहते हैं। ऐसे में किले का जीर्णोद्धार पर्यटन के लिए बड़ी संभावना से कम नहीं है। यहां खास बात यह है कि राष्ट्रीय चंबल सेंचुरी का इलाका होने के चलते संरक्षित जलीय जीवो को देखने आने वालों का जमावड़ा यहां लगा रहता है।
प्रशासनिक रूप से भरेह किला जनपद इटावा की दक्षिणी पूर्वी और औरैया की दक्षिणी पश्चिमी सीमा पर स्थित है। भरेह जाने के लिए नेशनल हाईवे 19 पर बाबरपुर से दक्षिण की ओर नवनिर्मित ग्वालियर रोड पर सिकरोड़ी पुल पारकर भरेह के इस किले की ऊंची मीनारें अपनी ओर खींचती हुई दिखाई देती हैं। यही है जंगे आजादी के सूरमाओ की शरण स्थली जो अपनी कहानी खुद ब खुद बयां करती है।













