नियमित कॉलोनी पर धारा 7A लागू करने को लेकर उपायुक्त से मिले इनैलो नेता।
शहरी छेत्र नियमित व नियंत्रित अधिनियम 1975 की धारा 7A को गलत तरीके से जनता पर थोपने के विरुद्ध उपायुक्त अम्बाला को ज्ञापन देने इनैलो प्रदेश प्रवक्ता ओंकार सिंह उपायुक्त अम्बाला के कार्यालय पहुंचे। उपायुक्त अम्बाला से नियमित कॉलोनियों बारे धारा 7A लागू न करने बारे बात करते हुए उन्होंने कहाकि इससे अम्बाला की जनता बहुत परेशान हैं जिसका शीघ्र हल जरूरी है। इस पर उपायुक्त अम्बाला ने कहाकि उन्होंने इस धारा के स्पष्टीकरण बारे पत्र सरकार को लिखा हुआ है। इस पर ओंकार सिंह ने कहाकि यदि उपायुक्त अम्बाला के द्वारा धारा 7A के स्पष्टीकरण बारे लिखे पत्र का 2 महीने के बाद भी सरकार ने कोई जवाब नही दिया तो आम व्यक्ति की स्तिथि क्या होगी यह विचारणीय तथ्य है। धारा 7A के प्रति मोजूदा सरकार के रवैये की सख्त निंदा करते हुए उन्होंने कहाकि धारा 7A नियमित कॉलोनी पर लागू ही नही होती लेकिन फिर भी अम्बाला प्रशासन ने 7A का हव्वा बना दिया है और जनता से धक्का कर किया जा रहा है। जायदाद खरीदना व बेचना प्रत्येक व्यक्ति का कानूनी व सविंधान के अनुच्छेद 300A के तहत सविंधानिक अधिकार है कोई अपराध नही परन्तु बहुत ही अफसोस कि बात है कि लोकतंत्र में सरकार जनता की सेवक होती है और सभी कायदे कानून जनता की भलाई व सहूलियत के लिए बनाए जाते हैं लेकिन मोजूदा सरकार जनता के सेवक की जगह जनता की मालिक बन बैठी है। शहरी छेत्र नियमित व नियंत्रित अधिनियम 1975 की धारा 7A की उपधारा (iii) में स्पष्ट लिखा है कि किसी भी कानून के तहत मान्यता प्राप्त कॉलोनी पर यह धारा लागू नही होती। इसके पश्चात मोजूदा सरकार के ही पत्र क्रमांक 8544-8626 दिनांक 19-12-2018 के अनुसार नियमित कॉलोनियों के सम्बंध में सिर्फ सम्बंधित स्थानीय निकाय विभाग मतलब नगरपालिका, नगरपरिषद या नगरनिगम से ही सरकार द्वारा निर्धारित शुल्क अदा करके एनओसी प्राप्त करने पर ही सम्बंधित तहसीलदार/नायब तहसीलदार रजिस्ट्री करेगा। यह पत्र सभी जिला उपायुक्त के पास भी भेजा गया और इस पर मोजूदा मुख्यमंत्री की सहमति भी की गई ऐसा इस पत्र में स्पष्ट है। इतना सब कुछ होंने के बावजूद भी अम्बाला प्रशासन ने नियमित कॉलोनी की रजिस्ट्री के लिए भी डीटीपी विभाग से एनओसी लेने की शर्त लगा रखी है जो कि जनता के साथ सरासर धक्का है। यहां यह भी बताना जरूरी है कि कोई भी एनओसी ऑनलाइन अप्लाई करने के पश्चात विभाग के पास सिर्फ दो ऑप्शन कंप्यूटर पर आते हैं, अप्रूव या रिजेक्ट। ऑब्जेक्शन का ऑप्शन ही नही आता जिसके कारण छोटी मोटी गलती के कारण एनओसी रिजेक्ट हो जाती है। कंप्यूटर में ऑब्जेक्शन का ऑप्शन जरूर होना चाहिए क्योंकि ऑनलाइन करने के 500 रुपये लगते हैं और रिजेक्ट करने में एक मिनट लगता है। रिजेक्शन के बाद फिर ऑनलाइन करवाने में 500 रुपये लगते हैं और जनता के समय की बर्बादी व परेशानी अलग से होती है। उन्होंने दावा किया कि वर्ष 2014 में बीजेपी सरकार आने के पश्चात अधिकतर अवैध कॉलोनियां या तो बीजेपी नेताओं ने काटी या फिर उनमें प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष इनका ही हाथ रहा। ऐसी कॉलोनियों की लिस्ट, खसरा नम्बर, काटने वाले का नाम, कॉलोनी के नाम व गॉव का नाम सबूत सहित शीघ्र ही उजागर किया जाएगा ताकि जनता को सच्चाई पता लग सके और भ्र्ष्ट नेताओं को नंगा किया जा सके जिससे ईमानदारी का टैग लगाए नेताओं की आंख खुले। आज जनता अपनी ही जमीन की खरीद फरोख्त करने को परेशान हैं। ऑनलाइन व्यवस्था शुरू होने से पूर्व रजिस्ट्री करने में सिर्फ 5 मिंट लगते थे जबकि ऑनलाइन व्यवस्था जनता की सुविधा व कार्य के सरलीकरण के लिए लागू की गई थी लेकिन यह व्यवस्था आज जनता के साथ साथ अधिकारियों के गले की भी फ़ांस बन चुकी है क्योंकि कभी तो नेटवर्क नही होता और कभी सर्वर डाउन होता है। आज अपनी ही जमीन बेचने के लिए सारी सरकारी प्रक्रियाएं पूरी करने में 3 महीने का समय लग जाता है और भ्र्ष्टाचार अलग से होता है। जनता की सुविधा के लिए उन्होने सरकार से मांग की कि जनहित में व्यवस्था को सुधारा जाए ताकि जनता को राहत मिल सके।












