इटावा(डा. पुष्पेंद्र सिंह चौहान)- औरैया की चंबल घाटी में जन्मे क्रांतिकारी महेश सिंह चौहान को ‘चंबल का भगत सिंह’ कहा जाता है। 1 अप्रैल 1947 को अंग्रेजों की साजिश में उनकी निर्मम हत्या कर दी गई थी। आज उनकी शहादत के 79 साल पूरे हो गए हैं, लेकिन उनका साहस और संघर्ष आज भी लोगों के दिलों में जिंदा है।
1923 में चकरनगर क्षेत्र के पास तेजपुर गांव में जन्मे महेश सिंह चौहान को देशभक्ति विरासत में मिली थी। उनके पिता जसवंत सिंह प्रथम विश्व युद्ध में राजपूत रेजीमेंट का हिस्सा रहे और बाद में स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई। उन्होंने कांग्रेस संगठन को मजबूत करने, चरखा आंदोलन से जुड़ने और सविनय अवज्ञा आंदोलन में भाग लेकर जेल की सजा भी काटी थी।
महेश सिंह चौहान ने छात्र जीवन में ही आजादी की लड़ाई का रास्ता चुन लिया। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान पढ़ाई छोड़कर उन्होंने क्रांतिकारी गतिविधियों में हिस्सा लिया। उनके नेतृत्व में युवाओं ने अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन तेज किया और अमावता में अंग्रेजों की कोठी को आग के हवाले कर दिया। लंबे समय तक फरार रहने के बाद उन्हें गिरफ्तार किया गया, लेकिन जेल से छूटने के बाद भी उनका संघर्ष जारी रहा।
बाद में उन्होंने पढ़ाई पूरी कर वैद्य और डॉक्टर के रूप में लोगों की सेवा की और ‘जनता के डॉक्टर’ के रूप में प्रसिद्ध हुए। 1946-47 में ‘आजाद हिंद सेना’ के सैनिकों की रिहाई के समर्थन में उन्होंने आंदोलनकियाऔरअजीतमल-औरैया क्षेत्र में किसानों और युवाओं को संगठित किया। अंग्रेजी शासन ने उनके बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए धारा 144 लागू कर दी, लेकिन इसके बावजूद हजारों लोग उनकी सभाओं में जुटते रहे।मार्च 1947 में मुरादगंज में हुए विशाल किसान सम्मेलन के बाद अंग्रेजों द्वारा साजिश रची गई और 1 अप्रैल 1947 को सिहोली के बीहड़ों में उन्हें अकेला पाकर घेर लिया और निर्ममता से उनकी हत्या कर दी।उनकी शहादत के बाद पूरे क्षेत्र में गुस्सा भड़क उठा। जनता ने अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाई और दोषियों के खिलाफ कड़ा प्रतिरोध किया।
आज भी हर साल 1 अप्रैल को उनकेबलिदान दिवस के रूप में श्रद्धांजलि दी जाती है। महेश सिंह चौहान की शहादत आने वाली पीढ़ियों के लिए देशभक्ति, साहस और अन्याय के खिलाफ लड़ने की प्रेरणा बनी हुई है।













