दिनांक – 19 अक्टूबर 2022
दिन – बुधवार
विक्रम संवत् – 2079
शक संवत् – 1944
अयन – दक्षिणायन
ऋतु – शरद
मास – कार्तिक (गुजरात एवं महाराष्ट्र में अश्विन मास)
पक्ष – कृष्ण
तिथि – नवमी दोपहर 02:13 तक तत्पश्चात दशमी
नक्षत्र – पुष्य सुबह 08:02 तक तत्पश्चात अश्लेषा
योग – साध्य शाम 05:33 तक तत्पश्चात शुभ
राहु काल – दोपहर 12:24 से 01:51 तक
सूर्योदय – 06:38
सूर्यास्त – 06:11
दिशा शूल – उत्तर दिशा में
ब्राह्ममुहूर्त – प्रातः 04:58 से 05:48 तक
निशिता मुहूर्त – रात्रि 12:00 से 12:50 तक
व्रत पर्व विवरण –
विशेष – नवमी को लौकी एवं दशमी को कलम्बिका शाक खाना सर्वथा त्याज्य है । (ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खंडः 27.29-34)
मंत्र शक्ति से आरोग्यता
मंत्रों में गजब की शक्ति होती है। मंत्र के एक-एक अंग का उच्चारण भी आपके शरीर व मन पर भिन्न-भिन्न प्रभाव डालता है । जैसे पानी में फेंका हुआ पत्थर तरंगें उत्पन्न करता है, उससे भी ज्यादा संवेदनकारी मंत्र का प्रभाव नस-नाड़ियों पर, मन-बुद्धि और वातावरण पर पड़ता है ।
अभी तो वैज्ञानिक भी भारतीय मंत्र-विज्ञान की महिमा जानकर दंग रह गये हैं । जैसे टाइपराइटर की कुंजियाँ (keys) दबाने से उनकी तीलियाँ उछलती हैं और कागज पर तीलियों के अक्षर यथायोग्य छप जाते हैं, ऐसे ही अमुक अमुक मंत्र-उच्चारण आपकी जीवनीशक्ति पर अपना-अपना विशिष्ट प्रभाव दिखाता है ।
शब्दों की ध्वनि का प्रभाव
शब्दों की ध्वनि का शरीर के अलग-अलग अंगों पर एवं वातावरण पर प्रभाव पड़ता है । कई शब्दों का उच्चारण कुदरतीरूप से होता है । आलस्य के समय कुदरती ‘आ… आ…’ होता है । रोग की पीड़ा के समय ‘ॐ.. ॐ…. का उच्चारण कुदरती ढंग से ‘ऊँ… ऊँ…’ के रूप में होता है ।
यदि कुछ अक्षरों का महत्त्व समझकर उच्चारण किया जाय तो बहुत सारे रोगों से छुटकारा मिल सकता है ।
‘अ’ के उच्चारण से हृदय पर अच्छा असर पड़ता है ।
‘आ’ के उच्चारण से जीवनीशक्ति, फेफड़ों, सीने आदि पर अच्छा प्रभाव पड़ता है । खाँसी के रोग, दमा, क्षयरोग आदि में आराम मिलता है, आलस्य दूर होता है ।
‘इ’ के उच्चारण से कफ व आँतों का विष दूर होता है । कब्ज, सिरदर्द और हृदयरोगों में भी बड़ा लाभ होता है । उदासीनता और क्रोध मिटाने में भी इसका उच्चारण बड़ा फायदा करता है । ‘इ’ का उच्चारण करनेवाले के गले, मस्तिष्क और आँतों का मल निवृत्त होकर ये अंग स्वच्छ निर्मल होते हैं ।
‘ई’ का उच्चारण करनेवाले का सिरदर्द, हृदय के रोग, उदासी आदि दूर होते हैं । मंत्र में भगवद्भाव रखनेवाले का अंतःकरण भगवन्मय होने लगता है ।
‘ऊ’ का उच्चारण पेडू की पीड़ा में आराम दिलाता है । इससे जिगर (liver), पेट, आँतड़ियों व पेडू के भाग पर लाभकारी प्रभाव पड़ता है और कब्जियत के रोग में भी लाभ होता है । प्रायः पेडू के रोग जिन देवियों को होते हैं उनके मुँह से प्राकृतिक ही ‘ऊँ… ऊँ…’ निकलता है तो उनकी सासु या माताएँ उन्हें टोकें नहीं अपितु कहें कि ‘बराबर कह, खूब कह ।’ इंजेक्शन फायदा करें उससे भी ज्यादा यह कुदरती ध्वनि पेडू के रोगों में आराम देने में मदद करती है ।
‘ओ’ के उच्चारण से ऊर्जाशक्ति का विकास होता है ।
‘औ’ उच्चारण करने से जननेन्द्रिय पर अच्छा प्रभाव पड़ता है ।
‘म’ के उच्चारण से मानसिक शक्तियाँ विकसित होती हैं । शायद इसीलिए भारत के ऋषियों ने जन्मदात्री माता के लिए ‘माँ’ शब्द पसंद किया होगा ।
‘ॐ’ का उच्चारण करने से ऊर्जा प्राप्त होती है और मानसिक शक्तियाँ विकसित होती हैं । मस्तिष्क, पेट और सूक्ष्म इन्द्रियों पर सात्त्विक असर होता है ।
‘ह्रौ’ उच्चारण करने से उदर के विकार, कब्ज की तकलीफ दूर होते हैं ।
‘ह्रीं’ उच्चारण करने से पाचन-तंत्र, गले और हृदय पर अच्छा प्रभाव पड़ता है ।
‘ह्रं’ उच्चारण करने से पेट, यकृत, तिल्ली, आँतों और गर्भाशय पर अच्छा असर पड़ता है ।