नई दिल्ली – उच्चतम न्यायालय ने कुछ महीना पहले तीन तलाक को अवैध घोषित कर मुस्लिम पर्सनल लॉ में सुधारों पर एक सार्थक बहस की शुरुआत की थी। अब लोकसभा में मुस्लिम महिला विवाह अधिकार संरक्षण विधेयक 2017 पारित हो गया है। इससे एक साथ तीन तलाक (तलाक-ए-बिद्दत) पर रोक लग सकेगी। पितृसत्तावादी कट्टरपंथी शुरू से ही शीर्ष कोर्ट के फैसले को नाकाम करने पर तुले हुए हैं। जमीयत उलमा-ए-हिंद के जनरल सेक्रेटरी मौलाना महमूद मदनी ने तो सीधे तौर पर न्यायालय के उक्त फैसले को मानने से इन्कार कर दिया था। 2002 में इसी मुद्दे पर शीर्ष कोर्ट के ऐसे ही एक निर्णय को कट्टरपंथी ताकतें बेअसर कर चुकी हैं। शायद इसीलिए सरकार तीन तलाक को अपराध घोषित करने की कवायद कर रही है। प्रस्तावित कानून में तीन साल सजा का प्रावधान है।बहरहाल सवाल है कि आखिर बुनियादी महिला अधिकारों की सुरक्षा के लिए इतने सख्त कानून की दरकार क्यों है? ऐसे सुधार तो सामाजिक आंदोलन के जरिये भी किए जा सकते थे, लेकिन क्या वजह है कि मुस्लिम समाज महिला अधिकारों को लेकर इतना उदासीन है? सवाल यह भी है कि वह कौन सी शक्तियां हैं, जो महमूद मदनी जैसे लोगों को सामाजिक सुधार रोकने को प्रोत्साहित करती हैं। वास्तव में, मुस्लिम पर्सनल लॉ में कई गंभीर पहलू हैं जिन्हें सुधारने की जरूरत है। इनमें संरक्षण के बिना तलाक, हलाला, बहुविवाह और उत्तराधिकार कानून में लिंग के आधार पर भेदभाव आदि मुख्य हैं। वे कौन से कारण हैं जिसकी वजह से समतामूलक समाज की पैरवी करने वाला संविधान होने के बावजूद समाज के एक हिस्से में महिला विरोधी रुख कायम है? मुस्लिमों का एक बुद्धिजीवी वर्ग, जो ज्यादातर सवर्ण (अशराफ) मुसलमान हैं, का मानना है कि महिला विरोधी कानून में सुधार आना चाहिए, लेकिन मौजूदा सरकार में नहीं। क्योंकि मौजूदा सरकार को मुसलमानों का विश्वास प्राप्त नही है, लेकिन सवाल है कि पिछली सरकारों के दौरान सुधार के कदम क्यों नहीं उठाए गए जबकि पिछली सरकारों को तो कथित रूप से मुसलमानों का विश्वास हासिल था? ये सभी सवाल इस मुद्दे को नए सिरे से देखने को मजबूर करते हैं।





