खालसा पंथ की स्थापना ही देश,धर्म व मानवता की रक्षा हेतु हुई।
सिख धर्मनियायी न तो किसी से धक्का करते हैं और न ही धक्का बर्दाश्त करते हैं।
खालसा पंथ की स्थापनापर्व की बधाई देते हुए इनेलो नेता ओंकार सिंह ने कहाकि सर्बनसदानी धन-धन श्री गुरु गोबिंद सिंह जी ने बैसाखी के पवित्र दिन ही देश व धर्म की रक्षा के लिए खालसा पंथ की स्थापना की थी। इस पावनपर्व पर धन-धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी की पावन अगुआई में निकाले गए नगर कीर्तन का स्वागत व नमन अपने निवास कच्चा बाज़ार में करते हुए उन्होंने कहाकि जब औरंगजेब और उसके नुमाइंदों के गैर-मुस्लिम जनता के प्रति अत्याचारी व्यवहार को देखते हुए धर्म की रक्षा हेतु गुरु गोबिंद सिंह ने सशस्त्र संघर्ष का निर्णय लिया तो उन्होंने ऐसे सिखों (शिष्यों) की तलाश की जो धर्म विचारधारा को आगे बढाएं, दुखियों की मदद करें और ज़रुरत पढने पर अपना बलिदान देनें में भी पीछे ना हटें। इसीलिए गुरु जी ने खालसा पंथ की स्थापना 1699 को बैसाखी वाले दिन आनंदपुर साहिब में की। इस दिन उन्होंने सर्वप्रथम पाँच प्यारों को अमृतपान करवा कर खालसा बनाया तथा तत्पश्चात् उन पाँच प्यारों के हाथों से स्वयं भी अमृतपान किया। खालसा शब्द खालस का प्रतीक है जिसका भाव है शुद्ध। आज भी गुरु जी की फ़ौज खालसा उनके बताए मार्ग पर अग्रसर है और देश, धर्म, गरीबों, मजलूमों व जरूरतमंदों केई रक्षा हेतु अपना आप न्योछावर करने को हमेशा तैयार रहती है। धन धन श्री गुरु गोबिंद सिंह जी के पदचिन्हों व बताए मार्ग पर चलकर ही आज गुरु जी की लाडली फ़ौज खालसा पूरे विश्व मे मानवता की सेवा करके सिख धर्म का नाम रोशन कर रही है। कोरोना महामारी हो, गुजरात के भुज में भूचाल आया हो,बंग्लादेश की आपदा हो, श्रीलंका की समस्या हो, सोमालिया का गृहयुद्ध हो या देश,प्रदेश या विश्व मे कहीं कोई भी आपदा आई हो सिख धर्मानुयायी हमेशा ही अपनी जान हथेली पर रखकर बिना किसी जाति,धर्म या सम्प्रदाय के भेदभाव के मानवजाति की सेवा के लिए हमेशा तैयार रहते हैं। यहां तक कि यूक्रेन युद्ध मे भी सिख धर्मानुयाईओ ने यूक्रेन में जाकर मानवजाति की सेवा करने की इजाजत मांगी है। आज पूरे विश्व मे सिख धर्मानुयाईओ को मान, सम्मान व प्यार की दृष्टि से देखा जाता है तो सिर्फ उनकी त्याग,प्रेम,प्यार और बलिदान की भावना के कारण। सिख धर्मनियायी न तो किसी के साथ गलत करते हैं और न ही गलत बर्दाश्त करते हैं। उन्होंने विश्व मे शांति के कार्यो के लिए नोबेल पुरस्कार देने वाली संस्था से आग्रह करते हुए मांग की कि मानवता के कार्यो में अग्रणी भूमिका निभाने के लिए विश्व शांति का नोबेल सिख धर्म को मिलना चाहिए। उन्होंने कहाकि बैसाखी नाम वैशाख माह से सम्बंधित है जो पंजाब और हरियाणा के किसान रबी की फसल के पकने की खुशी में मनाते हैं। नगरकीर्तन के स्वागत के अवसर पर सुखप्रीत सेठी, तरनप्रीत सिंह, रमेश यादव, प्राण नाथ वैद, विनोद छाबड़ा, सागर, अशोक धवन सहित अनेक गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे।

