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कोयले की कमी से बढ़ता बिजली संकट जनता परेशान

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कोयले की कमी से बढ़ता बिजली संकट जनता परेशान
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(सुभाष भारती): इस वर्ष अप्रैल के महीने में ही रिकार्डतोड़ गर्मी पडऩी शुरू हो जाने से बिजली की मांग अत्यधिक बढ़ जाने तथा कोयले की कमी के कारण देश के लगभग एक दर्जन राज्यों में बिजली का गंभीर संकट पैदा हो गया है। कोविड महामारी के दौरान कोयला खानों में खनन घट जाने से कोयले का भंडार पिछले 9 वर्षों के न्यूनतम स्तर पर पहुंच जाने के कारण थर्मल प्लांटों को कोयले की पूरी आपूर्ति नहीं हो पा रही। इससे कई राज्यों में घोषित और अघोषित बिजली कट अभी से बढ़ गए हैं।
पंजाब में 540 मैगावाट क्षमता वाला गोइंदवाल साहिब बिजली प्लांट तथा तलवंडी साबो पावर प्लांट का 660 मैगावाट क्षमता वाला यूनिट कोयला न होने से बंद हो जाने के  कारण 1200 मैगावाट बिजली उत्पादन तो इन दोनों थर्मल प्लांटों से ही घट गया है, जबकि अन्य  बिजली प्लांट भी कम बिजली पैदा कर रहे हैं और उनके पास भी नामात्र कोयला ही बचा है। यही कारण है कि राज्य में बिजली कट लगाए जा रहे हैं।
हरियाणा में भी स्थिति कुछ ऐसी ही है। वहां 11 अप्रैल को ही बिजली की मांग पिछले वर्ष की तुलना में इस वर्ष 20 प्रतिशत अधिक थी परंतु कोयले की कमी तथा तकनीकी खराबियों के चलते बिजली प्लांटों में क्षमता के अनुरूप काम न होने के परिणामस्वरूप बिजली उत्पादन बाधित होता आ रहा है तथा कट लग रहे हैं। उत्तर प्रदेश में प्रतिदिन 21 से 22 हजार मैगावाट बिजली की जरूरत है जबकि इसके मुकाबले में मात्र 19 से 20 हजार मैगावाट बिजली ही इस समय मिल रही है और वहां के थर्मल प्लांटों में बहुत ही कम कोयला बचा है, जिससे किसी भी समय वहां भी स्थिति बिगड़ सकती है।
महाराष्ट्र भी बिजली संकट का शिकार हो गया है और वहां मांग की तुलना में 2500 मैगावाट बिजली कम मिल रही है। उत्तराखंड, बिहार व झारखंड आदि में भी जरूरत से 3-3 प्रतिशत कम बिजली मिल रही है। कोरोना लॉकडाऊन के बाद दोबारा शुरू हुईं औद्योगिक गतिविधियों के परिणामस्वरूप कारखानों और उद्योगों में बिजली की खपत भी बढ़ी है तथा इसमें गर्मी के बढऩे के साथ-साथ और तेजी
आएगी।
देश में कोयले की कमी के कारणों में ‘कोल इंडिया लिमिटेड’ द्वारा कोयले के खनन में ठहराव आ जाना भी शामिल है। इसका एक कारण केंद्र और कोयला बहुल राज्यों की गैर भाजपा सरकारों के बीच अदायगी को लेकर तनातनी तथा बिजली उत्पादक कम्पनियों द्वारा ‘कोल इंडिया लिमिटेड’ को अदायगी में देरी करना भी है। कोयला खानों से थर्मल प्लांटों तक कोयला पहुंचाने के लिए रेलवे में ‘रैक’ (डिब्बों) की कमी भी एक समस्या है। अनेक राज्यों में कोविड से खराब हुई आर्थिक स्थिति के कारण राज्यों की बिजली वितरण कम्पनियों द्वारा
अपने बकायों की अदायगी करना भी मुश्किल हो गया है।
हालांकि केंद्रीय ऊर्जा मंत्री आर.के. सिंह ने बिजली उत्पादक कम्पनियों को अपना कोयला आयात 10 प्रतिशत तक बढ़ाने को भी कहा है परंतु इसमें समय लगने के कारण यह कोई तात्कालिक समाधान नहीं है लिहाजा आने वाले समय में बिजली संकट से राहत मिलने की संभावना अभी कुछ कम ही प्रतीत होती है। तय मापदंडों के अनुसार बिजली प्लांटों के पास हमेशा 26 दिनों तक चलने योग्य कोयले का भंडार रहना चाहिए परंतु वर्तमान में अधिकांश पावर प्लांट कमी के नाजुक स्तर पर पहुंचे हुए हैं। अत: जब तक पावर प्लांटों में कोयले का 26
दिनों का स्टाक रखना सुनिश्चित नहीं किया जाएगा, यह समस्या बनी ही रहेगी।
इसके साथ ही देश में कोयला आधारित प्लांटों की बजाय पनबिजली परियोजनाओं, सोलर एनर्जी (सौर ऊर्जा) परियोजनाओं और परमाणु बिजली परियोजनाओं को भी बढ़ावा देने की आवश्यकता है। इससे न केवल थर्मल प्लांटों से होने वाले प्रदूषण से बचाव होगा बल्कि बिजली की कमी दूर करने में भी सहायता मिलेगी।
हालांकि चीन, अमरीका, जापान और जर्मनी के बाद भारत स्थापित सोलर एनर्जी क्षमता में पांचवें स्थान पर है परंतु देश में सोलर पैनल लगा कर इस वर्ष 100 गीगावाट बिजली पैदा करने के लिए निर्धारित किए गए लक्ष्य को पूरा न कर पाना भी देश में बिजली संकट का एक कारण है। यह लक्ष्य पूरा होने पर देश में बिजली उपलब्धता की स्थिति कुछ बेहतर हो सकती थी।
अत: घरों पर सोलर एनर्जी (सौर ऊर्जा) पैनल लगाने के लिए आसान शर्तों पर ऋण और सबसिडी देने की योजना अमल में लाने, लोगों द्वारा बड़े पैमाने पर की जाने वाली बिजली चोरी रोकने तथा बिजली की ट्रांसमिशन में बिजली नष्ट होने की समस्या पर अंकुश लगाने से भी बिजली संकट कम करने में कुछ सहायता अवश्य मिल सकती है। देश की जनता को राष्ट्र प्रति अपना फर्ज समझते हुए बिजली का उपयोग कम से कम करें ताकि देश को ब्लैक आऊट होने से बचाया जा सके।

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